मैं मजदूर हूं! मेरी कौन सुनेगा ?

मैं मजदूर हूं! मेरी कौन सुनेगा ? 1

कोरोना काल ने तो पूरी दुनिया में तहस नहस मचा रखा है, आम जन जिवन से लेकर अर्थव्यवस्था तक चरमराई हुई है, ऐसे में अधिकतर देशों ने लॉकडाउन घोषित कर दिया है, और भारत में पीएम मोदी वाली सरकार ने भी देश में ताला लगा रखा है, जिससे लोगों को परेशानी भी है और सही भी लग रहा है। अब जाहिर सी बात है भारत लोकतांत्रिक देश है और ऐसे में देश की आबादी एक दो हिस्सों में नहीं बल्की कई वर्गों में बटी हुई है।

लॉकडाउन पर प्लानिंग

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एक वर्ग वो भी है जो एसी में बैठ कर सुबह मैंगो शेक पीकर और शाम को पकौड़े खा कर सोशल मीडिया पर वीडियो देख आग बबुला हो रहा है। प्रधानमंत्री कहां तक सही हैं कहां तक गलत इसका फैसला मैं तो नहीं कर सकता, लेकिन जो कहते हैं कि लॉकडउन पर सरकार की कोई प्लानिंग नहीं थी, और ना ही जनता को इसके बारे में बताया गया। प्लानिंग के तहत अगर लॉकडाउन लगाया गया होता तो शायद आज कोरोना मरीजों की जो संख्या है वो इतनी नहीं बल्की इतना होती कि हम आप सोच भी नहीं पाते और अगर जनता को इसके बारे में बता दिया गया होता तो फिर बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जब ट्रेन की बोगियों में बैठे लोगों को देख कर हम सोशल मीडिया पर कमेंट करते हैं तो वही मनोदशा उस दौरान भी होती। ऐसे में जो जहां तहां है वो वहीं रहे तो बेहतर हैं।

मैं मां हूं तुम खोंख में रहो या बाहर सारे दुख मैं झेल लूंगी

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लेकिन भारत में गरीबी भी आपार है तो ऐसे में एक ये भी वर्ग है जो आपके घरों के दिवारों में ईटें सिमेंट के साथ साथ अपने खून के कतरे और पसीनों के बुंदों से भी बनाया है। लेकिन उसी के बनाए मकान में बैठ कर आप हम सही गलत का फर्क निकालते हैं, और एक दूसरे के ऊपर थोपते रहते हैं। मजदूर वर्ग आज से नहीं पिस रहा ये तो वर्सों से ऐसे ही पिसते चला आ रहा है, सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो दिखे जिसे देखने के बाद कईयों की आखें नम हुई होंगी मेरी भी हुई, लेकिन इसपर राजनीति सही नहीं है। ये वो वर्ग है जो अपने हिस्से के लिए कभी नहीं लड़ा, सुबह का भूखा शाम को खाया लेकिन आवाज नहीं उठाया। मजदूर मिलों पैदल चलते गए अपनी दर्द बयां करते गए, लोग तमाशा देखते रहे, कई लोगों ने तमाशा समझा और लोग मददगार बने। एक मां अपने बच्चे को ट्रॉली बैग पर सुलाकर खिंचते हुए सुलाकर ले जाती है, तो एक मां अपने खोंख में करीब पांच महिने के बच्चे को लेकर पैदल तकलीफ सहती हुई चुपचाप चली जाती है। इनकी तकलीफ का मजाक बनाना सही नहीं, इसपर राजनीति सही नहीं। अगर बनना है तो मददगार बनिए।