राजनीतिक जुआ है राहुल गांधी का वायनाड से चुनावी मैदान में उतरना?

राजनीतिक जुआ है राहुल गांधी का वायनाड से चुनावी मैदान में उतरना? 1

वायनाड

कांग्रेस के अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने अपनी दादी इंदिरा गांधी और मां सोनिया गांधी के नक्‍शे कदम पर चलते हुए दक्षिण भारत से चुनावी जंग लड़ने जा रहे हैं। राहुल गांधी ने इसके लिए केरल की अल्‍पसंख्‍यक बहुल इलाका वायनाड लोकसभा सीट को चुना है। कांग्रेस पार्टी को उम्‍मीद है कि केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के इस ट्राइ जंक्‍शन पर बसे वायनाड से राहुल गांधी के चुनाव लड़ने से उसे तीनों ही राज्‍यों में फायदा होगा। इससे पहले वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में केरल की 20 सीटों में से 16 सीटों पर कांग्रेस पार्टी ने जीत दर्ज की थी। हालांकि कांग्रेस की इस रणनीति को विश्‍लेषक ‘चुनावी जुआ’ करार दे रहे हैं जिसमें गंभीर खतरे छिपे हुए हैं।

कांग्रेस नेताओं के मुताबिक पार्टी की केरल इकाई की ओर से अनुरोध किए जाने के बाद राहुल गांधी ने वायनाड से चुनाव लड़ने का फैसला किया। राहुल गांधी ने बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकता को संकट में डालते हुए भी इस सीट से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। दरअसल, इसकी एक बड़ी वजह यह है कि राहुल गांधी को दक्षिण भारत में काफी समर्थन हासिल है। इसके अलावा वायनाड में कांग्रेस पार्टी ने दो बार जीत हासिल की है। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को बहुत कम वोटों से जीत मिली थी लेकिन अब पार्टी को उम्‍मीद है कि राहुल के मैदान में आने से वह आसानी से जीत जाएगी।

कांग्रेस ने यह भी दावा किया है कि राहुल गांधी का वायनाड से चुनाव लड़ना उनकी दक्षिण के लोगों के जुड़ने की कोशिश है। वहीं विश्‍लेषकों की अगर मानें तो राहुल के वायनाड जाने के पीछे एक बड़ी वजह यह है कि पार्टी को एकजुट रखा जाए। कांग्रेस जब सत्‍ता में होती है तो यह आसानी हो जाता है लेकिन जब वह सत्‍ता से बाहर होती है तो उसे खुद को एकजुट रखना बेहद मुश्किल होता है। अपने इस ‘मास्‍टरस्‍ट्रोक’ के जरिए कांग्रेस पार्टी वर्ष 2014 की करारी शिकस्‍त के बाद फिर से पार्टी की स्थिति को मजबूत करना चाहती है। कांग्रेस का मानना है कि गठबंधन जरूरी है लेकिन अधिक से अधिक सीटें जीतने के उसके लक्ष्‍य के बल पर नहीं।

कांग्रेस पार्टी ने वायनाड से राहुल गांधी को उतारा है जहां उसका मुख्‍य मुकाबला बीजेपी से नहीं बल्कि वामदलों से है। बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में वामदल कांग्रेस के साथ खड़े रहे हैं। कांग्रेस पार्टी केरल में सभी 20 सीटों पर वामदलों से लड़ रही है लेकिन राहुल के यहां चुनावी मैदान में उतरने यह संकेत गया है कि कांग्रेस अध्‍यक्ष स्‍वयं अपने मुख्‍य प्रतिद्वंदी वामदलों के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं।

विश्‍लेषकों के मानना है कि वायनाड से राहुल गांधी को उतारकर कांग्रेस पार्टी ने आम चुनाव से ठीक पहले बड़ी सियासी गलती की है। उनका मानना है कि यदि कांग्रेस पार्टी खुद को दक्षिण भारत में मजबूत करना चाहती थी तो केरल उसके लिए सही राज्‍य नहीं है क्‍योंकि यहां वह पहले से ही काफी मजबूत है। वायनाड से चुनाव लड़कर अन्‍य राज्‍यों में प्रभाव डालने के उसके तर्क में भी दम नहीं है। कांग्रेस राहुल गांधी को कर्नाटक से चुनाव लड़ाकर इस मकसद को पूरा कर सकती थी।

1978 में इंदिरा गांधी ने कर्नाटक के चिकमंगलूर उपचुनाव में जीत हासिल कर अपनी वापसी का संकेत दिया था। जब इंदिरा गांधी 1980 में कांग्रेस को दोबारा सत्ता में लाने में सफल हुई थीं, तब उन्होंने आंध्र प्रदेश में मेडक और उत्तर प्रदेश में रायबरेली की सीटें जीती थीं। 1999 के चुनाव में सोनिया गांधी ने कर्नाटक के बेल्लारी में बीजेपी की सुषमा स्वराज को हराने के साथ ही अमेठी सीट भी जीती थी। केरल से चुनाव लड़ने का विकल्‍प किसी ने नहीं चुना था।

वायनाड से चुनाव लड़कर राहुल गांधी दोहरा संदेश दे रहे हैं। पहला- शक्तिशाली केंद्र के खिलाफ राज्‍यों के अधिकारों में घुसपैठ के खिलाफ वह दक्षिण भारत के राज्‍यों के समर्थन में हैं। दूसरा- दक्षिणपंथी बीजेपी के खिलाफ इस आम चुनाव में करो या मरो की जंग के बाद भी वामदलों का विरोध कर रहे हैं। इससे राहुल गांधी बेहद जटिल संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन लोगों को कांग्रेस और बीजेपी में भेदभाव करना बेहद कठिन होगा।

राहुल के इस कदम ने बीजेपी के खिलाफ उनके आक्रामक अभियान को ही कमजोर किया है। इससे विपक्षी एकता में भी दरार आई है जो बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस के साथ मिलकर सांप्रदायिकता के मुद्दे पर मोर्चा खोले हुए है। इससे पहले यूपीए सरकार में वामदल शामिल थे और उन्‍होंने कांग्रेस के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में अपनी मदद की थी। केरल एकमात्र ऐसा राज्‍य है जहां वामदल वास्‍तव में सत्‍ता में हैं और उसे डर है कि सत्‍ता विरोधी लहर उसके खिलाफ जा सकती है। राहुल के इस राजनीतिक जुए ने वामदलों की स्थिति और खराब की है।