95 सीटों पर जंग, 11 राज्यों में दिग्गजों के भाग्य का फैसला।

दिल्ली
देश के 11 राज्य1 और एक केंद्र शासित प्रदेश की 95 सीटों पर वोटिंग जारी है। कश्मीपर से लेकर कन्याटकुमारी और महाराष्ट्रऔ से लेकर उत्तर पूर्व तक सभी दल अपने किले को बचाने में जुटे हुए हैं। दक्षिण में कांग्रेस जहां बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है वहीं, बीजेपी कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इसके अलावा क्षेत्रीय दल भी इस बार के चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए जोर लगा रहे हैं।

बीजेपी दूसरे चरण में अपनी 27 सीटों को बचाए रखने के लिए पूरी ताकत झोंक चुकी है। पार्टी को ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और नार्थ ईस्टल में अच्छेक प्रदर्शन की उम्मीपद है। उधर, कांग्रेस पार्टी ने इस चरण की अपनी 12 सीटों को बचाए रखने और तमिलनाडु, कर्नाटक, ओडिशा, महाराष्ट्रक, यूपी में जोरदार प्रदर्शन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है।

दोनों ही राष्ट्री य दलों की प्रतिष्ठाि उन सीटों पर भी दांव पर लगी है जहां उनके सहयोगी दल मैदान में हैं। बीजेपी को उम्मीद है कि जेडीयू बिहार की पांच सीटों को जीतेगी। साथ ही उसे उम्मी द है कि तमिलनाडु में उसके सहयोगी दल अच्छाू प्रदर्शन करेंगे ताकि यूपी की भरपाई की जा सके। कांग्रेस भी इसके लिए प्रयासरत है कि आरजेडी बिहार में अपनी सीटें बचाए रखेगी और महाराष्ट्रर में एनसीपी अच्छा प्रदर्शन करेगी। केंद्र सत्ताे में आने के लिए कांग्रेस ने तमिलनाडु पर नजरें गड़ा रखी हैं जहां उसे सबसे अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीीद है। आइए जानते हैं कि 11 राज्यों की 95 सीटों पर किस पार्टी का क्या दांव पर लगा है।

उत्तर प्रदेश
लोकसभा चुनाव के लिए दूसरे चरण में पश्चिमी यूपी की 8 सीटों पर मतदान हो रहा है। इसमें से 6 सीटें गठबंधन के लिहाज से बीएसपी के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। खासकर ब्रज क्षेत्र में गठबंधन के लिए ‘मुस्लिम-दलित’ वोटरों के गठजोड़ का भी टेस्ट होगा। एसपी-बीएसपी के साथ आने से गठबंधन को इस वोट बैंक मुस्लिम और दलित को साथ रखने की उम्मीद है। बीएसपी चूंकि यहां 8 में से 6 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती उसी के सामने सबसे ज्यांदा है। एसपी यहां हाथरस सीट पर जबकि मथुरा की सीट आरएलडी के पास है।

दरअसल, जिन 8 सीटों पर दूसरे चरण के तहत मतदान हो रहे हैं, उनमें से 5 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओें की संख्या 20 फीसदी से अधिक है। वहीं 8 में से 4 सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं। आगरा को तो उत्तर भारत का ‘दलित कैपिटल’ तक कहा जाता है। वहीं नगीना सीट की बात करें तो यहां दलित और मुस्लिम वोटर 60 फीसदी से अधिक हैं। इसी तरह अमरोहा में करीब 55 फीसदी जबकि आगरा और अलीगढ़ में करीब 50 फीसदी मतदाता दलित और मुस्लिम समाज से हैं। गठबंधन में ये सभी सीटें मायावती के पास हैं। यही वजह है कि पिछले दिनों एक रैली में मायावती ने मुस्लिम वोटरों से सीधे-सीधे पार्टी को वोट देने और अपना वोट बंटने नहीं देने की अपील कर रही थी।

तमिलनाडु
दिल्लीड की सत्ताल के लिए तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटें बेहद अहम हैं और इसी पर कब्जे् के लिए डीएमके के नेतृत्व‍ में विपक्षी खेमे ने जोरदार चुनाव प्रचार चलाया। इसका न तो बीजेपी और न ही उसकी सहयोगी पार्टी एआईएडीएमके प्रभावी तरीके से जवाब दे सके। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद राज्यप की सियासत में काफी बदलाव आ चुका है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा था और 39 में से 38 सीटों पर उसके उम्मीादवारों की जमानत जब्ते हो गई थी। डीएमके ने भी बेहद शर्मनाक प्रदर्शन किया था। इस चुनाव में 38 में से 37 सीटों पर AIADMK ने कब्जा किया था।

इस बार के लोकसभा चुनाव में डीएमके और कांग्रेस पार्टी साथ-साथ हैं और उन्हें आशा है कि तमिलनाडु में इस बार ‘सूरज निकलेगा’ और जनता ‘हाथ’ का साथ देगी। अगर सहयोगी दलों की संख्याड की बात करें तो एनडीए कागज में ज्या्दा मजबूत है लेकिन एआईएडीएमके की करिश्माुई नेता जे जयललिता के निधन और टीटीवी दिनाकरण के उदय के बाद एआईएडीएमके की स्थिति कमजोर हुई है। राज्यत में बेहद प्रभावशाली थावर वोट बैंक 8 फीसदी के करीब अब दिनाकरण के साथ है। दिनाकरण की पार्टी एएमएमके राज्यभ में तीसरे मोर्चे के रूप में उभरी है।

दिनकरण के उदय से एनडीए को राहत मिली है। दिनकरण ने राज्ये के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पकड़ बढ़ा ली है। ये मुस्लिम वोटर अब तक डीएमके साथ थे। वहीं ऐक्ट र से राजनेता बने कमल हासन की पार्टी एमएनएम भी डीएमके के वोटबैंक में ही सेंध लगा सकती है। राज्यन की राजनीति में अभी भी जाति एक बड़ा फैक्ट र है। एनडीए जहां राज्या के पश्चिमी और उत्त्री हिस्सेत में गोउंडर-वन्नियार वोटों को साथ लाने पर जोर देर रही है वहीं डीएमके मुख्य् रूप से मध्ये और दक्षिणी तमिलनाडु पर। किसानों में हताशा और स्टजरलाइट कंपनी के खिलाफ विरोध एनडीए को नुकसान पहुंचा सकते हैं। हालांकि तमिलनाडु में लोकसभा चुनाव से ज्याफदा राज्यु की 22 विधानसभा सीटों के लिए हो रहे चुनाव की ज्याादा चर्चा है। इन 22 में से 18 सीटों पर गुरूवार को मतदान हो रहे हैं।

कर्नाटक
दक्षिण भारत के प्रवेश द्वार कर्नाटक में पहले चरण की 14 सीटों पर हो रहे चुनाव में बीजेपी को कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। मतों के बंटवारे को रोकने के लिए बीजेपी की धुर विरोधी कांग्रेस और जेडीएस 30 साल में पहली बार एक साथ लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। कर्नाटक दक्षिण भारत का एकमात्र ऐसा राज्यप है जहां पार्टी सत्ताथ में रह चुकी है और उसे कांग्रेस-जेडीएस गठजोड़ के बाद भी अच्छेच प्रदर्शन की उम्मीाद है। राज्यउ की 14 सीटों में कांग्रेस 10 और जेडीएस 4 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

उधर, बीजेपी 13 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ रही है और उसने मांड्या सीट पर अभिनेत्री सुमलता अंबरीश को समर्थन दिया है। मांड्या सीट से सीएम एचडी कुमारस्वाीमी के बेटे निखिल मैदान में हैं। पिछले चुनाव में बीजेपी ने 14 में से 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी लेकिन इस बार जेडीएस और कांग्रेस एकसाथ चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को एक गंभीर संकट से जूझना पड़ रहा है। मांड्या और मैसूरु-कोडगू में उसे कांग्रेस के बागी नेताओं की चुनौती से दो-चार होना पड़ रहा है। यही नहीं पुराने मैसूरु क्षेत्र में छह संसदीय क्षेत्रों में वोटों का एक-दूसरे को ट्रांसफर बड़ी चुनौती होगा। यहां कई नेताओं ने पार्टी के घोषित उम्मी्दवारों को समर्थन नहीं देने का ऐलान किया है।

महाराष्ट्र
महाराष्ट्रद की 48 में से 10 सीटों पर दूसरे चरण में मतदान हो रहा है। इस क्षेत्र के दो कांग्रेस नेताओं अशोक चव्हा्ण और सुशील कुमार शिंदे के प्रभाव का फैसला लोकसभा चुनाव में होगा। इसलिए ये दोनों नेता चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी के निशाने पर रहे। प्रधानमंत्री ने जहां आदर्श घोटाले के लिए पूर्व सीएम चव्हादण पर हमला बोला था वहीं ‘हिंदू आतंक’ को लेकर उन्होंघने शिंदे को घेरा था। इस चुनाव में यह फैसला होगा कि पीएम मोदी के हमले का कितना असर जनता पर हुआ। चव्हाेण नांदेड़ से एक बार फिर मैदान में हैं और शिंदे सोलापुर से अपनी किस्मरत अजमा रहे हैं।

मराठवाड़ा इलाके की छह सीटों में से चार पर बीजेपी-शिवसेना का कब्जाि है और दो पर कांग्रेस का। वहीं विदर्भ क्षेत्र की सभी तीन सीटों पर भगवा ब्रिगेड का कब्जाा है। इस तरह दूसरे चरण में कांग्रेस-एनसीपी को अपने किले पर दोबारा कब्जाड करने की चुनौती है जिसे उन्होंेने पिछले चुनाव में खो दिया था। कांग्रेस के इस लक्ष्यद में दलित नेता प्रकाश आंबेडकर संकट बनकर उभरे हैं। कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को ग्रामीण मराठवाड़ा से काफी उम्मींदे हैं जहां किसान परेशान हैं। विदर्भ क्षेत्र की तीन सीटों पर जातिगत गणित काफी मायने रखेगा।

पश्चिम बंगाल
लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में पश्चिम बंगाल की तीन सीटों पर मतदान जारी है। उत्तरी बंगाल की दार्जिलिंग, रायगंज और जलपाईगुड़ी सीटों पर ध्रुवीकरण के आसार दिखाई पड़ रहे हैं। इन सीटों पर चुनाव में घुसपैठ, एनआरसी (नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस) और सिटिजनशिप बिल (नागरिकता बिल) जैसे मुद्दे चर्चा में हैं। चुनाव में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और बीजेपी के बीच है।

दोनों ही पार्टियां चुनाव में जीत के लिए पूरी जोर-आजमाइश कर रही हैं। चुनाव आयोग ने दूसरे चरण में सुरक्षाबलों की तादाद बढ़ाई है। ममता बनर्जी ने भाषाई ने बीजेपी के उठाए मुद्दों का भाषाई राष्ट्रवाद के जरिए पलटवार करते हुए बंगाली हिंदू और मुस्लिम दोनों को अपने पाले में करने की कोशिश की है। ममता ने बीजेपी शासित असम में बिहार के लोगों के अलावा गोरखा समुदाय से भेदभाव का आरोप लगाया है।

ओडिशा
पश्चिमी और दक्षिणी पश्चिमी ओडिशा की 5 लोकसभा सीटों और 35 विधानसभा सीटों पर दूसरे चरण में मतदान हो रहा है। यह चरण राज्यि के मुख्यरमंत्री नवीन पटनायक और उनकी पार्टी बीजेडी के लिए काफी अहम है। नवीन पटनायक लगातार पांचवीं बार सत्तां में आएंगे या नहीं यह यक्ष प्रश्नए बना हुआ है। हालांकि उन्हें पश्चिमी ओडिशा में सत्ता विरोधी लहर और बीजेपी की ओर से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। राज्यं का यह इलाका बेहद पिछड़ा है। पिछले चुनाव में बीजेडी ने 5 में से 4 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार सुंदरगढ़ और बालनगिर को छोड़कर बीजेडी और बीजेपी के बीच तीन सीटों पर सीधे लड़ाई है।

बिहार
बिहार में पांचों सीटों पर एनडीए की ओर से जेडीयू लड़ रही है। वहीं गठबंधन की ओर से 3 पर कांग्रेस और 2 सीटों पर आरजेडी है। 2014 के चुनाव में चार सीटें गठबंधन के खाते में गई थीं और पूर्णिया से जेडीयू जीती थी। अगर सामाजिक समीकरण की बात करें तो इनमें से अधिकतर सीटें मुस्लिम बहुल वाले इलाके में है। बांका सीट पर जेडीयू को बीजेपी के बागी उम्मीदवार का भी सामना करना पड़ रहा है तो किशनंगज में कांग्रेस की जेडीयू के अलावा ओवैसी की पार्टी से कड़ा मुकाबला है। पूर्णिया में इस बार कांग्रेस से उम्मीदवार उदय सिंह हैं, जो 2014 में बीजेपी के उम्मीदवार थे।

असम
2014 में कांग्रेस सिल्चर और स्वशासी जीती थी। AIUDF ने करीमगंज और बीजेपी ने मंगलदाई व नागाओं सीट जीती थी। इस बार सारी सीटों पर कड़ी टक्कर है। बीजेपी ने एक सीट पर उम्मीदवार भी बदला है। प्रियंका गांधी ने सिल्चर में रोड शो भी किया था। बीजेपी की ओर से मोदी और शाह समेत कई बड़े नेता प्रचार कर चुके हैं। पांचों सीटों पर अल्पसंख्यकों के अलावा चाय बागान में काम करने वाले मजदूर और इससे जुड़े लोग निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

जम्मू-कश्मीर
उधमपुर सीट बीजेपी के दबदबे वाली है। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह इस बार फिर से मैदान में हैं। वहीं, श्रीनगर सीट अब्दुल्ला परिवार की कही जाती है। हालांकि 2014 में पीडीपी जीत गई। पर बाद के उपचुनाव में फारुख अब्दुल्ला फिर जीते। इस बार दिलचस्प यह है कि बीजेपी ने यहां से घाटी के बड़े चेहरे खालिद जहांगीर को उतारा है।

छत्तीसगढ़
पिछली बार ये सभी सीटें बीजेपी के खाते में गई थीं। ये सभी सीटें नक्सल प्रभावित इलाके में हैं। डर के कारण यहां वोटिंग में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है। पिछले साल दिसंबर में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत मिलने के बाद कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं। बीजेपी मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर वोट मांग रही है। कांग्रेस किसानों के मुद्दे और न्याय योजना पर वोट मांग रही है।